बिल्लू का नया एजेंडा स्कूल के बच्चो के साथ अब क्या करने वाला है बिल्ली।।Expose By Atul Mishra Nagpur

 

बिल्लू का नया एजेंडा स्कूल के बच्चो के साथ अब क्या करने वाला है बिल्ली।।Expose By Atul Mishra Nagpur
भारत के सभी स्कूलों को “न्यू वर्ल्ड ऑर्डर” ड्रग माफ़िया के वितरण केंद्र बना दिया गया है. स्कूल के अंदर वैक्सीन दे कर बच्चों को मारा जा रहा है जबरदस्ती दवाई खिलाई जा रही है।।।

स्कूल के शिक्षकों और अन्य स्टाफ़ को इस्तेमाल किया जा रहा है बच्चों के “वैक्सिनेशन” स्टेटस चेक करने के लिए और उन्हें ज़हरीले इंजेक्शन लगवाने के लिए मजबूर करने के लिए.

स्कूलों में बच्चों के ब्लड सैंपल भी लिए जा रहे हैं.

आधार डिजिटल आईडी के महा-फ़्रॉड के साथ अब “अपार” (“APAAR” – ऑटोमेटिड परमानेंट एकेडेमिक अकाउंट रजिस्ट्री) के नए फ़्रॉड के ज़रिए बच्चों का डेटा इकट्ठा किया जा रहा है और उन्हें शिक्षा के “डिजिटल टोकनीकरण” (digital tokenization) की तरफ़ धकेला जा रहा है.

शिक्षा के “डिजिटल टोकनीकरण” के पीछे फ़ाशिस्ट “न्यू वर्ल्ड ऑर्डर के अरबपति लुटेरे हैं (विशेष कर आई.टी. इंडस्ट्री से जुड़े बिल गेट्स, नारायण मूर्ति और नंदन नीलेकणि).

शिक्षा का “डिजिटल टोकनीकरण” दरअसल एक शैतानी वैश्विक प्रोजेक्ट का हिस्सा है जिसके तहत पूरी दुनिया की “लेबर मार्किट” (श्रम बाज़ार) पर गिने-चुने “स्टेक-होल्डर” अरबपति लुटेरों का कंट्रोल स्थापित किया जा रहा है.

इसके लिए “स्किलिंग” (skilling), “अप-स्किलिंग” (upskilling) और “री-स्किलिंग” (reskilling) जैसे शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है.

भारत में “स्किलिंग” का फ़्रॉड औपचारिक रूप से शुरू हुआ 2008 में जब “नैशनल स्किल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन” (NSDC) बनाई गई.

[NSDC सरकारी सतह पर बनाई गई एक प्राइवेट कम्पनी है क्योंकि निजी निवेशकों की हिस्सेदारी 51% है. मतलब “पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) है. “PPP” का मतलब ही है फ़्रॉड!]

इसके अलावा भारत के शिक्षण संस्थानों में “क्रेडिट” (credit) और “क्रेडिट ट्रांसफ़र” (credit transfer) का सिस्टम थोपा गया ताकि शिक्षा प्राप्त करने की पूरी प्रक्रिया को नापे-तोले जाने वाले “क्रेडिट” या “टोकन” में बदला जा सके.

शिक्षा का “डिजिटल टोकनी-करण” एक महा-फ़्रॉड है क्योंकि ये भारतीय समाज की सदियों से चली आ रही पारंपरिक ज्ञान व कौशल सीखने-सिखाने की स्वतंत्र व्यवस्था (“फ़्री मार्किट”) का विनाश कर रहा है.

इस पारंपरिक व्यवस्था (जिसे अर्थशास्त्री “असंगठित क्षेत्र” या “इन्फ़ॉर्मल इकॉनमी” भी कहते हैं) के ज़रिए भारत में करोड़ों लोग आज़ादी के साथ अपना रोज़गार और कारोबार करते हैं — बिना सरकारी (या प्राइवेट कम्पनियों की) रोकटोक के.

ये पारंपरिक व्यवस्था ही पूरे भारत के समाज की (और “अर्थव्यवस्था” की) रीढ़ है जिसकी प्रतिदिन की “मार्किट वैल्यू” खरबों रुपये है.

“डिजिटल टोकनी-करण” के तहत गिने-चुने “स्टेकहोल्डर” अरबपति लुटेरों को ज्ञान व कौशल प्राप्त करने की व्यवस्था में “सर्टिफ़िकेशन” का एकाधिकार दिया जा रहा है.

डिजिटली-करण (digitalization) के बहाने यही “स्टेकहोल्डर” अरबपति बदमाश भारत में सभी उत्पाद और सेवाओं की “सप्लाई चेन” पर भी क़ब्ज़ा कर रहे हैं ONDC (ओपन नेटवर्क फ़ॉर डिजिटल कॉमर्स) के ज़रिए जोकि एक और महा-फ़्रॉड है.

मतलब भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक स्वायत्तता (autonomy) का सर्वनाश करके पूरे देश को ग़ुलाम बनाया जा रहा है “डिजिटली-करण” के ज़रिए!

सर्वनाश से बचने के लिए डिजिटल आईडी और डिजिटली-करण के सभी मंसूबों को आग लगाने की ज़रूरत है!

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